🪔 नवरात्रि 2026

नवरात्रि के नौ भोग: किस दिन माता को क्या अर्पित करें

📅 11 अक्टूबर 2026 – 20 अक्टूबर 2026 नौ स्वरूप

संक्षेप में

नवरात्रि के नौ दिन हर स्वरूप को एक अलग भोग अर्पित करने की परंपरा है — पहले दिन घी से लेकर नवें दिन हलवा-चना-पूरी तक। यह सूची देवी के स्वरूप से जुड़ी है, वार से नहीं, इसलिए रंगों की तरह हर वर्ष नहीं बदलती। जो भोग उपलब्ध न हो उसके स्थान पर फल अथवा मिश्री भी अर्पित की जा सकती है — परंपरा में भाव को वस्तु से ऊपर रखा गया है।

नौ दिन के नौ भोग

दिनतिथिदेवीभोग
दिन 1 11 अक्टूबर 2026, रविवार माँ शैलपुत्री गाय का शुद्ध घी — मान्यता है कि इससे आरोग्य की प्राप्ति होती है।
दिन 2 12 अक्टूबर 2026, सोमवार माँ ब्रह्मचारिणी शक्कर अथवा मिश्री और फल — मान्यता है कि इससे आयु बढ़ती है।
दिन 3 13 अक्टूबर 2026, मंगलवार माँ चंद्रघंटा दूध अथवा दूध से बनी खीर — मान्यता है कि इससे कष्टों से मुक्ति मिलती है।
खीर बनाने की विधि
दिन 4 14 अक्टूबर 2026, बुधवार माँ कूष्मांडा मालपुआ — मान्यता है कि इससे बुद्धि एवं निर्णय शक्ति बढ़ती है।
दिन 5 15 अक्टूबर 2026, गुरुवार माँ स्कंदमाता केला — मान्यता है कि इससे आरोग्य की प्राप्ति होती है।
दिन 6 16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार माँ कात्यायनी शहद — मान्यता है कि इससे सौंदर्य एवं आकर्षण की प्राप्ति होती है।
दिन 7 17 अक्टूबर 2026, शनिवार माँ कालरात्रि गुड़ — मान्यता है कि इससे शोक एवं बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
दिन 8 19 अक्टूबर 2026, सोमवार माँ महागौरी नारियल — मान्यता है कि इससे मनोकामना पूर्ण होती है।
दिन 9 19 अक्टूबर 2026, सोमवार माँ सिद्धिदात्री हलवा, चना एवं पूरी — यही कन्या पूजन का भी परंपरागत भोग है।

ध्यान दें — इस वर्ष सप्तमी दो दिन पड़ रही है, इसलिए नवरात्रि 10 दिन की है, पर देवी स्वरूप नौ ही रहते हैं — भोग भी नौ ही। सप्तमी वाले दोनों दिन माँ कालरात्रि का ही भोग रहेगा। इस वर्ष अष्टमी और नवमी एक ही दिन हैं — उस दिन दोनों भोग एक साथ अर्पित किए जाते हैं।

भोग अर्पित करने का क्रम

  1. भोग बनाते समय चखें नहीं — परंपरा में अर्पित होने से पहले प्रसाद चखा नहीं जाता।
  2. ताँबे, पीतल, चाँदी अथवा मिट्टी के पात्र में रखें। लोहे एवं स्टील से प्रायः बचा जाता है।
  3. भोग के साथ एक पात्र में जल रखें — परंपरा में भोग के साथ जल अर्पित किया जाता है।
  4. देवी के समक्ष रखकर ध्यान करें, फिर आरती करें।
  5. आरती के बाद प्रसाद परिवार में बाँटें और कुछ अंश बाहर किसी को दें।
  6. नवें दिन का भोग कन्या पूजन में कन्याओं को कराया जाता है — कन्या पूजन विधि देखें।

भोग न मिले तो क्या करें

मालपुआ, शहद अथवा नारियल हर घर में हर दिन उपलब्ध नहीं होता, और यही सबसे आम चिंता है। परंपरा में इसका सीधा उत्तर है — जो उपलब्ध हो वही अर्पित करें। फल, मिश्री, गुड़ अथवा केवल जल भी स्वीकार्य है। कोई प्रायश्चित अथवा दंड-विधान नहीं है, और पूजा अधूरी नहीं मानी जाती।

बहुत से परिवार नौ दिन एक ही भोग — प्रायः मिश्री, फल या पंचामृत — अर्पित करते हैं। यह भी उतनी ही प्रचलित परंपरा है।

व्रत रखने वालों के लिए

भोग देवी को अर्पित होता है, और प्रसाद व्रत में भी लिया जाता है। ध्यान केवल इतना रखें कि व्रत में साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक लिया जाता है और अनाज वर्जित माना जाता है — अधिकतर भोग मीठे होने के कारण यह प्रश्न प्रायः साथ बनने वाले भोजन पर लागू होता है। व्रत के नियम और फलाहार की पूरी सूची नवरात्रि व्रत के नियम पृष्ठ पर है।

ऊपर दी गई मान्यताएँ लोक परंपरा हैं, शास्त्रीय विधान नहीं। क्षेत्र और परिवार के अनुसार भोग की सूची कुछ भिन्न भी मिलती है — अपने घर की परंपरा को प्राथमिकता दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवरात्रि में किस दिन कौन सा भोग लगाया जाता है?

पहले दिन घी, दूसरे शक्कर अथवा मिश्री, तीसरे दूध या खीर, चौथे मालपुआ, पाँचवें केला, छठे शहद, सातवें गुड़, आठवें नारियल और नवें दिन हलवा-चना-पूरी। यह सूची देवी के स्वरूप से जुड़ी है, इसलिए हर वर्ष एक सी रहती है।

भोग न लगा पाएँ तो क्या पूजा अधूरी रह जाती है?

नहीं। परंपरा में भाव को वस्तु से ऊपर रखा गया है। जो भोग उपलब्ध न हो उसके स्थान पर फल, मिश्री अथवा केवल जल भी अर्पित किया जा सकता है। कोई प्रायश्चित विधान नहीं है।

भोग का प्रसाद किसे देना चाहिए?

अर्पित करने के बाद प्रसाद परिवार में बाँटा जाता है और कुछ अंश बाहर किसी को दिया जाता है। नवें दिन का हलवा-चना-पूरी वही भोग है जो कन्या पूजन में कन्याओं को कराया जाता है।

भोग में साधारण नमक इस्तेमाल कर सकते हैं?

व्रत के भोजन में सेंधा नमक लिया जाता है, साधारण नमक नहीं। देवी को अर्पित होने वाले भोग प्रायः मीठे होते हैं, इसलिए यह प्रश्न अधिकतर प्रसाद के साथ बनने वाले व्रत के भोजन पर लागू होता है।

क्या नौ दिन एक ही भोग लगाया जा सकता है?

हाँ। बहुत से परिवार नौ दिन केवल मिश्री, फल अथवा पंचामृत अर्पित करते हैं। नौ अलग भोग की सूची परंपरा है, अनिवार्यता नहीं।

भोग कब लगाया जाता है — सुबह या शाम?

प्रायः प्रातःकाल की पूजा के बाद, आरती से पहले अथवा उसके तुरंत बाद। सायंकालीन आरती करने वाले उस समय भी अर्पित करते हैं। कोई एक समय बाध्यकारी नहीं है।

नवें दिन का भोग और कन्या पूजन का भोजन एक ही है?

हाँ, परंपरा में दोनों एक ही हैं — हलवा, काले चने और पूरी। यही कन्याओं को कराया जाता है और यही देवी को अर्पित होता है।

भोग के लिए बर्तन कौन सा लेना चाहिए?

परंपरा में ताँबे, पीतल, चाँदी अथवा मिट्टी के पात्र लिए जाते हैं। लोहे एवं स्टील से प्रायः बचा जाता है। यह लोक परंपरा है — न मिले तो जो उपलब्ध हो वही शुद्ध कर के लिया जा सकता है।