नवरात्रि दूसरा दिन — माँ ब्रह्मचारिणी की कथा, मंत्र और पूजा विधि
संक्षेप में
नवरात्रि के 2 दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है — 12 अक्टूबर 2026, सोमवार। मंत्र ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥, भोग और दिन का रंग हरा।
नाम का अर्थ
ब्रह्म यहाँ तप के अर्थ में है और चारिणी अर्थात आचरण करने वाली — तप का आचरण करने वाली। शिव को पति रूप में पाने के लिए इन्होंने जो कठोर तप किया, उसी से यह नाम मिला।
कथा
पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद देवर्षि नारद के परामर्श पर इन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। हज़ार वर्ष केवल फल-फूल पर, फिर सौ वर्ष शाक पर, और अंत में बेल के सूखे पत्तों तक का त्याग कर दिया — इसी से इनका एक नाम अपर्णा पड़ा। इस कठोर तप के कारण ही ये ब्रह्मचारिणी कहलाईं।
स्वरूप
श्वेत वस्त्र धारण किए, दाहिने हाथ में जपमाला और बाएँ हाथ में कमंडल। कोई वाहन नहीं — ये पैदल ही चलती हैं, तपस्विनी के रूप में।
मंत्र एवं ध्यान श्लोक
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
ध्यान श्लोक:
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
मंत्र का जाप 108 बार करने की परंपरा है। पूजा आरंभ करने से पूर्व ध्यान श्लोक का पाठ किया जाता है।
भोग एवं रंग
- भोग — शक्कर अथवा मिश्री और फल — मान्यता है कि इससे आयु बढ़ती है।
- दिन का रंग — हरा
रंगों की परंपरा शास्त्रीय विधान नहीं, लोक परंपरा है — वस्त्र न मिल पाए तो पूजा में कोई कमी नहीं आती।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- कलश एवं देवी के समक्ष दीप जलाएँ; अखंड ज्योति जल रही हो तो उसकी बाती ठीक कर लें।
- माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान कर ध्यान श्लोक का पाठ करें।
- पुष्प, अक्षत, रोली एवं धूप अर्पित करें।
- मंत्र का 108 बार जाप करें।
- भोग अर्पित कर आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- जौ के पात्र में थोड़ा जल छिड़कना न भूलें।
इस दिन की विशेष बात
इस स्वरूप में देवी के हाथ में कोई अस्त्र नहीं, केवल जप माला और कमंडलु हैं। नवरात्रि का यह दिन संयम और धैर्य से जोड़ा जाता है — इसीलिए व्रत का संकल्प दृढ़ करने का दिन भी कहा जाता है।
ग्रह संबंध
परंपरा में नवरात्रि के नौ स्वरूपों को नौ ग्रहों से जोड़ा जाता है। माँ ब्रह्मचारिणी का संबंध मंगल से माना जाता है। यह लोक परंपरा है, शास्त्रीय विधान नहीं — पूजा का फल इससे बँधा हुआ नहीं माना जाता।
महत्व
तप, संयम और धैर्य की देवी। विद्यार्थी एवं साधक विशेष रूप से इनकी उपासना करते हैं। परंपरा में इस दिन का स्थान स्वाधिष्ठान चक्र माना गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवरात्रि के दूसरे दिन कौन सी देवी की पूजा होती है?
माँ ब्रह्मचारिणी की — तप एवं संयम की अधिष्ठात्री देवी।
माँ ब्रह्मचारिणी को अपर्णा क्यों कहते हैं?
तप के अंतिम काल में उन्होंने बेल के सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया था। अ + पर्ण अर्थात बिना पत्ते के — इसी से नाम अपर्णा पड़ा।
दूसरे दिन क्या भोग लगाएँ?
शक्कर अथवा मिश्री और मौसमी फल। परंपरा में इसे दीर्घायु देने वाला बताया गया है।
माँ ब्रह्मचारिणी का वाहन क्या है?
इनका कोई वाहन नहीं है। तपस्विनी रूप में ये पैदल ही दर्शाई जाती हैं, हाथों में जपमाला एवं कमंडल लिए।