✦ प्रेरणादायक सुविचार ✦

श्रीमद्भगवद्गीता के अनमोल श्लोक और उनका अर्थ

✦ सभी श्लोक ✦

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (2.47)

अर्थ

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (4.7)

अर्थ

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् अवतार लेता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (4.8)

अर्थ

साधु पुरुषों के उद्धार के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (2.23)

अर्थ

इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न ही वायु सुखा सकती है। आत्मा अमर है।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (2.22)

अर्थ

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नये शरीर धारण करती है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (18.66)

अर्थ

सब धर्मों को त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (4.39)

अर्थ

श्रद्धावान्, साधनपरायण और जितेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शांति को पा लेता है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (2.48)

अर्थ

हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर — यही समता योग कहलाती है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (6.5)

अर्थ

मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को गिराना नहीं चाहिए; क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

— श्रीमद्भगवद्गीता (2.62)

अर्थ

विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।