कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.47)
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनमोल श्लोक और उनका अर्थ
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (18.66)
सब धर्मों को त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.47)
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (4.7)
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात् अवतार लेता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (4.8)
साधु पुरुषों के उद्धार के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.23)
इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न ही वायु सुखा सकती है। आत्मा अमर है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.22)
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नये शरीर धारण करती है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (18.66)
सब धर्मों को त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (4.39)
श्रद्धावान्, साधनपरायण और जितेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही परम शांति को पा लेता है।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.48)
हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर — यही समता योग कहलाती है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (6.5)
मनुष्य को स्वयं अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को गिराना नहीं चाहिए; क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
— श्रीमद्भगवद्गीता (2.62)
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।