गायत्री मंत्र को समस्त वैदिक मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ एवं "मंत्रों की माता" कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद से लिया गया है और बुद्धि, तेज एवं आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। नीचे गायत्री मंत्र का संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ एवं जाप विधि दी गई है।
ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं ।
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक एवं देवस्वरूप परमात्मा (सवितृदेव) को हम अपने अन्तःकरण में धारण करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। सूर्यदेव का ध्यान करते हुए रुद्राक्ष या तुलसी की माला से कम से कम एक माला (108 बार) मंत्र का शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण करें। प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल — तीनों संध्याओं में जाप करना अत्यंत फलदायी है। मन शांत रखें तथा नियमित रूप से जाप करें।
गायत्री मंत्र का जाप कब करना चाहिए?
तीन संध्याओं में — प्रातः सूर्योदय से पूर्व, मध्याह्न और संध्या सूर्यास्त के समय। प्रातःकाल का ब्रह्म मुहूर्त सर्वोत्तम माना गया है।
गायत्री मंत्र कितनी बार जपना चाहिए?
सामान्यतः 108 बार, रुद्राक्ष अथवा तुलसी की माला से। समय कम हो तो 11 अथवा 27 बार भी किया जा सकता है — नियमितता संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।
गायत्री मंत्र किस ग्रंथ से है?
ऋग्वेद से, मंडल तीन का सूक्त 62। इसके ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं और यह सविता देव (सूर्य) को समर्पित है।
क्या स्त्रियाँ गायत्री मंत्र जप सकती हैं?
हाँ। अनेक परंपराओं में स्त्रियों द्वारा गायत्री जप स्वीकृत है और आर्य समाज सहित कई संप्रदायों में इसे प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ प्राचीन रीतियाँ भिन्न मत रखती हैं — अपने परिवार अथवा गुरु की परंपरा का पालन करें।
जाप के समय क्या ध्यान रखें?
स्नान कर स्वच्छ आसन पर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख कर बैठें, मेरुदंड सीधा रखें और उच्चारण शुद्ध रखें। माला की सुमेरु मणि को लाँघा नहीं जाता।