महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली वैदिक मंत्र है, जिसे यजुर्वेद एवं ऋग्वेद में स्थान प्राप्त है। इसे "मृत्यु को जीतने वाला मंत्र" कहा जाता है। नीचे इसका संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ एवं जाप विधि दी गई है।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो सुगन्धित (सुयश युक्त) हैं और सम्पूर्ण जगत का पोषण करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा (ककड़ी) अपनी बेल के बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, उसी प्रकार वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें (मोक्ष प्रदान करें), किन्तु अमरत्व (मुक्ति) से हमें विमुख न करें।
सोमवार अथवा प्रदोष काल में स्नान करके स्वच्छ आसन पर बैठें। भगवान शिव अथवा शिवलिंग के समक्ष घी का दीपक जलाकर रुद्राक्ष की माला से मंत्र का जाप करें। कम से कम एक माला (108 बार) अथवा सामर्थ्य अनुसार अधिक जाप करें। रोग निवारण एवं संकट शांति हेतु सवा लाख जाप का अनुष्ठान श्रेष्ठ माना जाता है। शुद्ध उच्चारण एवं श्रद्धा आवश्यक है।
महामृत्युंजय मंत्र किसलिए जपा जाता है?
परंपरा में इसे आरोग्य, दीर्घायु एवं भय से मुक्ति के लिए जपा जाता है। रोग अथवा संकट के समय परिवारजन इसका जाप करते हैं। यह चिकित्सा का विकल्प नहीं, श्रद्धा एवं मानसिक बल का सहारा है।
महामृत्युंजय मंत्र कितनी बार जपें?
सामान्य जाप 108 बार होता है। विशेष संकल्प में सवा लाख जाप का अनुष्ठान किया जाता है, जो प्रायः किसी जानकार के मार्गदर्शन में होता है।
यह मंत्र किस वेद से है?
ऋग्वेद से, और यजुर्वेद में भी आता है। इसे त्र्यंबकं मंत्र अथवा रुद्र मंत्र भी कहा जाता है, और यह भगवान शिव को समर्पित है।
जाप का सर्वोत्तम समय क्या है?
ब्रह्म मुहूर्त अथवा प्रदोष काल। सोमवार एवं महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व है। रुद्राक्ष की माला से जाप करने की परंपरा है।
जाप करते समय क्या सामग्री चाहिए?
शिवलिंग अथवा शिव का चित्र, घी का दीपक, जल, बेलपत्र और रुद्राक्ष की माला। जाप के समय शिवलिंग पर जल की धार अर्पित करने की परंपरा भी है।