🪔 पूजा विधि

कन्या पूजन विधि: नवरात्रि अष्टमी-नवमी पर कन्या भोज

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संक्षेप में

कन्या पूजन नवरात्रि की अष्टमी या नवमी को किया जाता है — 2026 में 18 और 19 अक्टूबर को। इसमें दो से दस वर्ष तक की नौ कन्याओं और एक बालक (बटुक भैरव) के चरण धोकर, तिलक कर, हलवा-पूरी और काले चने का भोजन कराया जाता है, फिर दक्षिणा एवं उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है।

कन्या पूजन को कंजक अथवा कुँवारी पूजन भी कहा जाता है और यही नवरात्रि व्रत का पारण माना जाता है। मान्यता है कि इन दिनों कन्याओं में स्वयं देवी का अंश निवास करता है। 2026 में अष्टमी 18 अक्टूबर एवं नवमी 19 अक्टूबर को है — कुछ पंचांगों में दोनों 19 अक्टूबर को भी दर्शाए गए हैं, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें।

कितनी कन्याएँ और किस आयु की

परंपरा में दो से दस वर्ष तक की कन्याएँ बुलाई जाती हैं। प्रत्येक आयु का अपना स्वरूप बताया गया है:

  • 2 वर्ष — कुमारिका : दुःख एवं दरिद्रता का नाश
  • 3 वर्ष — त्रिमूर्ति : धन-धान्य एवं परिवार में सुख
  • 4 वर्ष — कल्याणी : कल्याण एवं विद्या
  • 5 वर्ष — रोहिणी : रोगों से मुक्ति
  • 6 वर्ष — कालिका : विजय एवं राजयोग
  • 7 वर्ष — चंडिका : ऐश्वर्य
  • 8 वर्ष — शांभवी : वाद-विवाद में विजय
  • 9 वर्ष — दुर्गा : शत्रु नाश
  • 10 वर्ष — सुभद्रा : मनोकामना पूर्ति

साथ में एक बालक भी बिठाया जाता है, जिसे बटुक भैरव अथवा लांगुर कहा जाता है — मान्यता है कि भैरव के बिना देवी पूजन पूर्ण नहीं होता।

पूजन की विधि

  • एक दिन पूर्व कन्याओं को आदरपूर्वक निमंत्रण दें।
  • घर आने पर उनके चरण धोएँ और स्वच्छ वस्त्र से पोंछें।
  • माथे पर रोली एवं अक्षत का तिलक लगाएँ।
  • कलाई पर मौली बाँधें।
  • आसन पर बिठाकर आरती उतारें।
  • भोजन परोसें — हलवा, पूरी एवं काले चने पारंपरिक भोग है।
  • भोजन के बाद यथाशक्ति दक्षिणा, फल एवं उपहार दें।
  • अंत में उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और द्वार तक विदा करने जाएँ।

भोजन क्या बनाया जाता है

पारंपरिक भोग तीन वस्तुओं का होता है — सूजी का हलवा (मिठास), पूरी (अन्न) और काले चने की सूखी सब्जी (शक्ति)। कुछ क्षेत्रों में खीर, नारियल एवं मौसमी फल भी रखे जाते हैं। भोजन शुद्ध सात्विक होना चाहिए — लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं किया जाता।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • कन्याओं की संख्या पूरी न हो पाए तो जितनी उपलब्ध हों उतनी से भी पूजन किया जा सकता है — भाव मुख्य है।
  • किसी कन्या को जबरदस्ती न बिठाएँ; उनकी सुविधा का ध्यान रखें।
  • उपहार में ऐसी वस्तु दें जो उनके काम आए — पुस्तक, कपड़े अथवा स्टेशनरी।
  • भोजन के समय स्वयं खड़े होकर परोसें, बैठकर नहीं।
  • कन्याओं के जाते समय उन्हें द्वार तक छोड़ने जाना शुभ माना जाता है।

यदि कन्याएँ उपलब्ध न हों

आजकल शहरों में यह कठिनाई आम है। ऐसी स्थिति में अनेक परिवार किसी विद्यालय, अनाथालय अथवा आसपास के जरूरतमंद बच्चों को भोजन एवं उपहार देकर यह परंपरा निभाते हैं। शास्त्रीय दृष्टि से भी इसका फल समान बताया गया है, क्योंकि मूल भाव कन्या एवं बालक के रूप में देवी-देवता का सम्मान है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कन्या पूजन अष्टमी को करें या नवमी को?

दोनों तिथियाँ मान्य हैं और यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। 2026 में अष्टमी 18 अक्टूबर एवं नवमी 19 अक्टूबर को है।

कन्या पूजन में कितनी कन्याएँ बुलानी चाहिए?

नौ कन्याएँ एवं एक बालक (बटुक भैरव)। संख्या पूरी न हो तो जितनी उपलब्ध हों, उतनी से भी पूजन किया जा सकता है।

कन्या पूजन में क्या खिलाया जाता है?

सूजी का हलवा, पूरी एवं काले चने की सूखी सब्जी — यही पारंपरिक भोग है।

कन्याओं की आयु कितनी होनी चाहिए?

दो से दस वर्ष तक। प्रत्येक आयु का देवी के एक स्वरूप से संबंध बताया गया है।

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