आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है — वह एकमात्र रात जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण माना जाता है। 2026 में यह 25 अक्टूबर को है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा एवं कौमुदी व्रत भी कहा जाता है।
खीर चाँदनी में क्यों रखी जाती है
परंपरा है कि इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। इसीलिए गाय के दूध एवं चावल की खीर बनाकर, चाँदी या काँच के पात्र में, जालीदार कपड़े से ढककर खुली छत पर रखी जाती है। रातभर चाँदनी में रहने के बाद अगली प्रातः इसे प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
आयुर्वेद की दृष्टि से भी इसका आधार बताया जाता है — शरद ऋतु में पित्त बढ़ता है, और दूध-चावल की खीर शीतल एवं पित्तशामक मानी जाती है। इसी कारण दमा एवं श्वास रोगियों के लिए इस रात की खीर विशेष लाभकारी बताई जाती है।
खीर बनाने का तरीका
- गाय का दूध लें — लगभग एक लीटर, और उसे धीमी आँच पर गाढ़ा करें।
- भीगे हुए चावल (2 बड़े चम्मच) डालकर पकाएँ।
- चावल गलने पर शक्कर, इलायची एवं मेवा मिलाएँ।
- खीर को चाँदी के पात्र में रखना सर्वोत्तम माना जाता है; न हो तो काँच का पात्र लें।
- पतले सूती अथवा जालीदार कपड़े से ढककर रात्रि 10 बजे के बाद खुले आकाश के नीचे रखें।
- प्रातः स्नान के बाद भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करें एवं बाँटें।
ध्यान रहे — खीर को पूरी तरह खुला न छोड़ें; धूल एवं कीट-पतंगों से बचाव के लिए हल्का जालीदार कपड़ा आवश्यक है।
कोजागरी — “को जागर्ति”
पूर्वी भारत, विशेषकर बंगाल एवं ओडिशा में यह रात कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाई जाती है। “को जागर्ति” का अर्थ है — “कौन जाग रहा है?” मान्यता है कि इस रात माँ लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हुई यही पूछती हैं, और जो जागकर उनकी आराधना कर रहा होता है, उसे धन-समृद्धि का वरदान देती हैं। इसीलिए इस रात जागरण, लक्ष्मी पूजन एवं पासे के खेल की परंपरा है।
रास पूर्णिमा
ब्रज परंपरा में यही रात महारास की रात मानी जाती है, जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ रास रचाया था। मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में इस रात विशेष सजावट एवं रासलीला का आयोजन होता है।
पूजा विधि
- संध्या को स्नान कर सफेद वस्त्र धारण करें।
- चौकी पर माँ लक्ष्मी अथवा श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।
- घी का दीपक जलाएँ, सफेद पुष्प एवं मिष्ठान्न अर्पित करें।
- चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें — जल में दूध मिलाकर।
- लक्ष्मी सूक्त अथवा “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” का जाप करें।
- रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करें।
इस दिन का व्रत
कुछ परिवारों में इस दिन कौमुदी व्रत रखा जाता है — दिनभर फलाहार लेकर रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद खीर से पारण किया जाता है। संतान की कुशलता की कामना से भी अनेक माताएँ यह व्रत रखती हैं।