सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी देवता को समर्पित हैं, और सोमवार भगवान शिव का दिन है। “सोम” का अर्थ चंद्रमा भी है, जो शिव के मस्तक पर विराजमान हैं — इसीलिए इस दिन शिव आराधना का विशेष विधान बताया गया है।
यह व्रत कौन रखता है
अविवाहित कन्याएँ मनचाहा वर पाने के लिए, विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु एवं सुखी दांपत्य के लिए, और पुरुष मनोकामना पूर्ति व मानसिक शांति के लिए यह व्रत रखते हैं। चंद्रमा के दोष अथवा मानसिक अस्थिरता की स्थिति में भी सोमवार व्रत की सलाह दी जाती है।
पूजा विधि
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ — विशेषकर सफेद — वस्त्र धारण करें।
- व्रत का संकल्प लें कि कितने सोमवार नियमित रखने हैं।
- शिवलिंग पर क्रम से जल, दूध, दही, शहद, घी एवं शक्कर (पंचामृत) अर्पित करें, फिर शुद्ध जल से अभिषेक करें।
- बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, भाँग एवं सफेद पुष्प चढ़ाएँ — बेलपत्र सदैव तीन पत्तियों वाला और चिकनी सतह नीचे की ओर रखकर अर्पित करें।
- चंदन का त्रिपुंड लगाएँ, दीप-धूप दिखाएँ और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
- शिव चालीसा अथवा सोमवार व्रत कथा का पाठ करें और अंत में आरती करें।
व्रत कथा (संक्षेप में)
प्रचलित कथा एक धनी किंतु निःसंतान साहूकार की है, जो शिव जी की आराधना करता था। माता पार्वती के आग्रह पर शिव जी ने उसे पुत्र का वरदान दिया, किंतु शर्त यह रही कि पुत्र केवल बारह वर्ष जीवित रहेगा। समय आने पर पुत्र को शिक्षा हेतु काशी भेजा गया। मार्ग में विवाह हो गया और बारहवें वर्ष उसकी मृत्यु का समय आ पहुँचा। पत्नी एवं परिवार के अटूट विश्वास और सोमवार व्रत के प्रभाव से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को पूर्ण आयु का वरदान देकर जीवित कर दिया।
कथा का भाव — श्रद्धा, धैर्य और नियमित उपासना से असंभव भी संभव होता है।
व्रत के नियम
- दिनभर फलाहार लें — फल, दूध, मेवा; संध्या पूजा के बाद एक समय सात्विक भोजन।
- नमक का प्रयोग सीमित रखें; कई परंपराओं में सेंधा नमक ही लिया जाता है।
- शिव पूजा में तुलसी, केतकी का फूल, हल्दी एवं नारियल का जल वर्जित माना गया है।
- व्रत के दिन क्रोध, कटु वचन एवं तामसिक भोजन से दूर रहें।
- संकल्प लिए सोमवारों की संख्या पूरी करें — बीच में छोड़ना उचित नहीं माना जाता।
सोलह सोमवार और श्रावण सोमवार
सोलह सोमवार व्रत विशेष संकल्प के साथ लगातार सोलह सोमवार किया जाता है और इसके उद्यापन का अलग विधान है। श्रावण मास के सोमवार सर्वाधिक फलदायी माने जाते हैं, क्योंकि यह पूरा मास शिव को समर्पित है। इनके अतिरिक्त प्रदोष व्रत एवं मासिक शिवरात्रि भी शिव उपासना की प्रमुख तिथियाँ हैं।
दान एवं उपाय
इस दिन सफेद वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है — चावल, दूध, दही, सफेद वस्त्र, चाँदी अथवा चीनी। शिव मंदिर में जल चढ़ाना और किसी जरूरतमंद को भोजन कराना व्रत का पुण्य बढ़ाने वाला माना गया है।
सोलह सोमवार व्रत और उद्यापन
सोलह सोमवार व्रत शिव उपासना का सबसे संकल्पबद्ध रूप है। इसे किसी भी शुक्ल पक्ष के सोमवार से आरंभ किया जाता है और लगातार सोलह सप्ताह चलाया जाता है। प्रत्येक सोमवार को गेहूँ के आटे, गुड़ और घी से बना चूरमा भोग लगाया जाता है, जिसे तीन भागों में बाँटकर एक भाग प्रसाद स्वरूप बाँटा जाता है।
उद्यापन सत्रहवें सोमवार को किया जाता है — इसमें शिव-पार्वती का विधिवत पूजन, हवन और ब्राह्मण भोजन का विधान है। उद्यापन के दिन भी व्रत रखा जाता है और चूरमे का भोग पाँच या ग्यारह लोगों में बाँटा जाता है।
अभिषेक के द्रव्य और उनका फल
शिव अभिषेक में जो द्रव्य चढ़ाया जाता है, परंपरा में उसका अलग फल बताया गया है:
- जल — शांति एवं ताप का शमन
- दूध — सौम्यता, संतान सुख
- दही — स्वास्थ्य एवं स्थिरता
- घी — वंश वृद्धि
- शहद — वाणी में मधुरता
- गन्ने का रस — सुख-समृद्धि
- भस्म — वैराग्य एवं रोग नाश
अभिषेक सदैव उत्तर दिशा की ओर मुख करके, धीमी धार से और मंत्र जाप के साथ किया जाता है।
पूजा सामग्री की सूची
- शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्र, ताँबे का लोटा
- बेलपत्र (तीन पत्तियों वाले), धतूरा, आक के फूल, भाँग
- सफेद चंदन, भस्म, सफेद पुष्प, कच्चा दूध
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- घी का दीपक, धूप, कपूर, रुद्राक्ष की माला
- भोग — चूरमा, सफेद मिष्ठान्न अथवा खीर
श्रावण सोमवार क्यों विशेष हैं
पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने इसी मास में धारण किया था, और उनके ताप को शांत करने हेतु देवताओं ने जल अर्पित किया। यही परंपरा आज कांवड़ यात्रा एवं जलाभिषेक के रूप में चली आ रही है। श्रावण के सोमवारों को रखा गया व्रत सामान्य सोमवार से कई गुना फलदायी माना जाता है, और इन्हीं दिनों शिव मंदिरों में सर्वाधिक भीड़ रहती है।
प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि
सोमवार के अतिरिक्त शिव उपासना की दो और प्रमुख तिथियाँ हैं। प्रदोष व्रत प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी को होता है और इसकी पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में की जाती है — सोमवार को पड़ने वाला प्रदोष “सोम प्रदोष” कहलाता है और सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मासिक शिवरात्रि प्रत्येक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है, जिसमें रात्रि जागरण एवं चार प्रहर की पूजा का विधान है।