पंचांग देखते समय सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यही होता है — राहु काल क्या है और आज कब है? यह कोई निश्चित घड़ी का समय नहीं, बल्कि गणना से निकलने वाला अंतराल है।
राहु काल की गणना कैसे होती है
सूर्योदय से सूर्यास्त तक के कुल समय को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक भाग लगभग डेढ़ घंटे का होता है (यदि दिन 12 घंटे का हो)। इनमें से एक निश्चित भाग उस वार का राहु काल कहलाता है:
- सोमवार — दूसरा भाग
- मंगलवार — सातवाँ भाग
- बुधवार — पाँचवाँ भाग
- गुरुवार — छठा भाग
- शुक्रवार — चौथा भाग
- शनिवार — तीसरा भाग
- रविवार — आठवाँ भाग
एक सरल उदाहरण: यदि सूर्योदय प्रातः 6:00 और सूर्यास्त संध्या 6:00 बजे हो, तो दिन 12 घंटे का हुआ और प्रत्येक भाग डेढ़ घंटे का। ऐसे में सोमवार का राहु काल दूसरा भाग अर्थात प्रातः 7:30 से 9:00 तक रहेगा।
यह हर शहर में अलग क्यों होता है
क्योंकि गणना सूर्योदय एवं सूर्यास्त पर आधारित है, और ये दोनों हर नगर के अक्षांश-देशांतर के अनुसार बदलते हैं। यही कारण है कि दिल्ली और चेन्नई के राहु काल में अंतर आता है, तथा गर्मी और सर्दी के दिनों में भी अंतर रहता है। इसलिए किसी सामान्य तालिका की अपेक्षा अपने नगर का पंचांग देखना अधिक सही है।
राहु काल में क्या नहीं किया जाता
- नया व्यापार अथवा कार्य आरंभ करना
- विवाह, सगाई या अन्य मांगलिक संस्कार
- गृह प्रवेश एवं भूमि पूजन
- वाहन, आभूषण या सम्पत्ति की खरीद
- यात्रा का शुभारंभ
क्या इसमें पूजा-पाठ भी वर्जित है
नहीं। नित्य पूजा, जप, ध्यान एवं पाठ राहु काल में भी किए जा सकते हैं — इनका निषेध नहीं है। कुछ परंपराओं में तो राहु से संबंधित उपाय, जैसे दुर्गा उपासना अथवा राहु शांति, विशेष रूप से इसी काल में की जाती है। निषेध केवल नए शुभ कार्यों के आरंभ पर है।
यमगंड और गुलिक काल
राहु काल की तरह ही यमगंड और गुलिक काल भी दिन के आठ भागों से निकाले जाते हैं। गुलिक काल को शुभ माना जाता है, जबकि यमगंड में भी नए कार्य आरंभ करने से बचा जाता है। पंचांग में ये तीनों साथ दिए जाते हैं।
उदाहरण तालिका — 6:00 से 18:00 वाले दिन के लिए
यदि किसी दिन सूर्योदय प्रातः 6:00 और सूर्यास्त संध्या 6:00 बजे हो, तो प्रत्येक भाग डेढ़ घंटे का होगा और राहु काल इस प्रकार बनेगा:
| वार | भाग | राहु काल |
|---|---|---|
| सोमवार | दूसरा | 07:30 – 09:00 |
| मंगलवार | सातवाँ | 15:00 – 16:30 |
| बुधवार | पाँचवाँ | 12:00 – 13:30 |
| गुरुवार | छठा | 13:30 – 15:00 |
| शुक्रवार | चौथा | 10:30 – 12:00 |
| शनिवार | तीसरा | 09:00 – 10:30 |
| रविवार | आठवाँ | 16:30 – 18:00 |
यह केवल उदाहरण है। वास्तविक समय आपके नगर के सूर्योदय-सूर्यास्त पर निर्भर करता है, इसलिए इसे सीधे न अपनाएँ।
यमगंड और गुलिक काल की गणना
ये भी दिन के उन्हीं आठ भागों से निकाले जाते हैं। यमगंड में नए कार्य आरंभ करने से बचा जाता है, जबकि गुलिक काल शुभ माना जाता है और इसमें आरंभ किए गए कार्यों की पुनरावृत्ति होती है — इसीलिए इसमें शुभ कार्य करने की सलाह दी जाती है, किंतु ऋण लेना या देना वर्जित माना गया है।
राहु काल से जुड़ी भ्रांतियाँ
- “राहु काल में कुछ भी नहीं करना चाहिए” — यह सही नहीं है। नित्य कार्य, नौकरी, पढ़ाई, यात्रा की निरंतरता सब चलती रहती है; निषेध केवल नए शुभ कार्यों के शुभारंभ पर है।
- “राहु काल का समय सब जगह एक होता है” — नहीं, यह सूर्योदय आधारित है और हर नगर में भिन्न होता है।
- “राहु काल में पूजा नहीं होती” — नित्य पूजा एवं जप निषिद्ध नहीं हैं।
- “आपात स्थिति में भी रुकना चाहिए” — चिकित्सा अथवा आपातकालीन कार्य किसी काल की प्रतीक्षा नहीं करते; शास्त्र भी विवेक को प्राथमिकता देते हैं।
दक्षिण भारत में विशेष महत्व
राहु काल की परंपरा दक्षिण भारत में अधिक कठोरता से निभाई जाती है — तमिलनाडु, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में विवाह, गृह प्रवेश एवं व्यापार आरंभ के समय इसे प्रमुखता से देखा जाता है। कई मंदिरों में राहु काल के दौरान विशेष रूप से दुर्गा अथवा राहु शांति की पूजा की जाती है, क्योंकि इस काल में की गई राहु-संबंधी उपासना फलदायी मानी जाती है।