🪔 भोग एवं प्रसाद

पंजीरी बनाने की विधि — जन्माष्टमी का पारंपरिक प्रसाद

✍ vinodvinod.rawat@gmail.com 3 मिनट पढ़ें

संक्षेप में

पंजीरी धनिया पाउडर अथवा गेहूँ के आटे को घी में भूनकर, उसमें मखाना, मेवा और बूरा मिलाकर बनाई जाती है। जन्माष्टमी पर धनिया की पंजीरी का विशेष महत्व है क्योंकि व्रत में अनाज वर्जित रहता है। इसे बिना पकाए भी रखा जा सकता है और यह कई दिन तक चलती है।

पंजीरी उत्तर भारत का पारंपरिक प्रसाद है, जो मुख्यतः दो अवसरों पर बनता है — जन्माष्टमी पर धनिया की पंजीरी, और प्रसूता स्त्रियों के लिए गोंद-आटे की पंजीरी। यहाँ जन्माष्टमी वाली विधि दी गई है।

धनिया पंजीरी क्यों

जन्माष्टमी का व्रत निर्जला अथवा फलाहारी होता है और उसमें अनाज वर्जित रहता है। धनिया अनाज की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए इसी से प्रसाद बनाया जाता है। आयुर्वेद में धनिया को शीतल एवं पाचक माना गया है — भाद्रपद की उमस में यह उपयुक्त भी बैठता है।

सामग्री

  • साबुत धनिया पाउडर — 1 कटोरी (ताज़ा पिसा हुआ)
  • देसी घी — 3 से 4 बड़े चम्मच
  • मखाना — 1 कटोरी
  • बूरा या तगार — 3/4 कटोरी (स्वादानुसार)
  • काजू, बादाम, पिस्ता — 2 बड़े चम्मच (कटे हुए)
  • सूखा नारियल — 2 बड़े चम्मच (कसा हुआ)
  • मखाना, छुहारा एवं मिश्री — वैकल्पिक
  • इलायची पाउडर — 1/2 छोटा चम्मच

विधि

  • कड़ाही में एक चम्मच घी गरम कर मखाने को धीमी आँच पर कुरकुरा होने तक भूनें, फिर निकालकर दरदरा कूट लें।
  • उसी कड़ाही में थोड़ा घी डालकर कटे मेवे हल्के सुनहरे होने तक भूनें और अलग रखें।
  • अब बचा हुआ घी डालकर धनिया पाउडर डालें और धीमी आँच पर लगातार चलाते हुए भूनें।
  • जब रंग हल्का सुनहरा हो जाए और खुशबू आने लगे — लगभग 5–7 मिनट — तो आँच बंद कर दें। धनिया जल्दी जलता है, इसलिए आँच तेज़ न करें।
  • मिश्रण को पूरी तरह ठंडा होने दें। गर्म में बूरा मिलाने से वह पिघल जाएगा।
  • ठंडा होने पर मखाना, मेवा, नारियल, इलायची एवं बूरा मिलाएँ। पंजीरी तैयार है।

आटे की पंजीरी

यदि व्रत का नियम न हो तो गेहूँ के मोटे आटे से भी पंजीरी बनाई जाती है — आटे को घी में भूनकर उसी प्रकार मेवा एवं बूरा मिलाया जाता है। इसमें गोंद भूनकर मिलाने की परंपरा भी है, जो सर्दियों में विशेष रूप से बनाई जाती है।

टिप्स

  • धनिया ताज़ा पिसा हो तो स्वाद और सुगंध दोनों बेहतर रहते हैं।
  • भूनते समय कड़ाही मोटे तले की लें, वरना नीचे से जल सकता है।
  • बूरा न हो तो पिसी मिश्री का प्रयोग करें — शक्कर से स्वाद अलग हो जाता है।
  • एयरटाइट डिब्बे में यह 8–10 दिन तक चलती है।

भोग कैसे लगाएँ

जन्माष्टमी पर रात्रि 12 बजे — कृष्ण जन्म के समय — लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर, नए वस्त्र पहनाकर पंजीरी एवं माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें, क्योंकि विष्णु स्वरूपों का भोग तुलसी के बिना पूर्ण नहीं माना जाता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जन्माष्टमी पर धनिया की पंजीरी ही क्यों बनती है?

क्योंकि व्रत में अनाज वर्जित होता है और धनिया अनाज नहीं है। साथ ही यह पाचक एवं शीतल माना जाता है।

पंजीरी में बूरा कब मिलाएँ?

मिश्रण पूरी तरह ठंडा होने के बाद। गर्म में मिलाने पर बूरा पिघलकर चिपचिपा हो जाता है।

पंजीरी कितने दिन तक चलती है?

एयरटाइट डिब्बे में रखने पर 8 से 10 दिन तक। घी की मात्रा अधिक हो तो और अधिक समय चलती है।

क्या पंजीरी व्रत में खा सकते हैं?

हाँ, धनिया वाली पंजीरी फलाहार में मान्य है। आटे वाली पंजीरी व्रत में नहीं ली जाती।

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