गुरुवार अर्थात बृहस्पतिवार, देवगुरु बृहस्पति एवं भगवान विष्णु का दिन है। ज्योतिष में बृहस्पति को विवाह, संतान, ज्ञान एवं भाग्य का कारक माना गया है — इसीलिए यह व्रत विशेषकर विवाह योग्य कन्याओं में अत्यंत प्रचलित है।
व्रत का उद्देश्य
विवाह में विलंब, संतान प्राप्ति, धन की स्थिरता, शिक्षा में उन्नति एवं कुंडली में गुरु के कमजोर होने पर यह व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि गुरु बलवान हो तो जीवन में मार्गदर्शन एवं संयोग स्वतः बनने लगते हैं।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें।
- केले के वृक्ष की पूजा करें — जल में हल्दी मिलाकर जड़ में अर्पित करें।
- वृक्ष पर पीला धागा बाँधें, हल्दी का तिलक करें और चने की दाल व गुड़ चढ़ाएँ।
- घी का दीपक जलाकर बृहस्पति देव एवं विष्णु जी का ध्यान करें।
- “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” अथवा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें।
- गुरुवार व्रत कथा सुनें और आरती करें।
ध्यान रहे — केले के वृक्ष की पूजा गुरुवार को की जाती है, किंतु उसी दिन केला खाना वर्जित माना जाता है।
व्रत कथा (संक्षेप में)
कथा एक राजा की है जो अत्यंत दानी था, किंतु उसकी रानी न दान करती थी, न स्नान-पूजा में रुचि रखती थी। बृहस्पति देव ने साधु रूप में आकर रानी से भिक्षा माँगी। रानी ने कहा कि वह इस धन से मुक्ति चाहती है। साधु ने उपाय बताया, जिसे रानी ने पालन किया — और घर की सारी समृद्धि चली गई। दरिद्रता में रानी को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। तब राजा एवं रानी ने विधिपूर्वक गुरुवार व्रत किया, बृहस्पति देव प्रसन्न हुए और उनका वैभव लौट आया।
कथा का भाव — धन का सदुपयोग एवं दान ही उसे टिकाए रखता है।
व्रत के नियम
- दिन में एक बार पीला भोजन — चने की दाल, बेसन, पीले चावल अथवा खिचड़ी।
- इस दिन नमक का त्याग किया जाता है; गुड़ से मीठा किया जाता है।
- गुरुवार को बाल एवं नाखून नहीं काटे जाते, न ही कपड़े धोए जाते हैं — यह परंपरागत निषेध है।
- केला चढ़ाया जाता है पर खाया नहीं जाता।
- सामान्यतः 16 गुरुवार का संकल्प लिया जाता है, फिर उद्यापन किया जाता है।
दान एवं उपाय
पीली वस्तुओं का दान — चने की दाल, हल्दी, पीला वस्त्र, गुड़, केसर अथवा सोना। मंदिर में केले का पौधा लगाना, गाय को गुड़-चना खिलाना और गुरु अथवा शिक्षक का सम्मान करना बृहस्पति को बल देने वाले उपाय माने जाते हैं।