सत्यनारायण व्रत किसी विशेष तिथि तक सीमित नहीं है, किंतु पूर्णिमा तथा संक्रांति के दिन इसे करना विशेष फलदायी माना गया है। गृह प्रवेश, विवाह, संतान जन्म अथवा किसी मनोकामना की पूर्ति पर भी यह पूजा कराई जाती है।
पूजा की तैयारी
- घर एवं पूजा स्थान की सफाई कर चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएँ।
- भगवान सत्यनारायण (विष्णु) का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें।
- केले के पत्तों से मंडप बनाएँ — यह परंपरागत विधान है।
- कलश में जल भरकर आम के पत्ते एवं नारियल रखें।
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) एवं तुलसी दल तैयार रखें।
प्रसाद — चूरमा या सिंजारा
सत्यनारायण पूजा का प्रसाद सवा के अनुपात में बनाया जाता है — जैसे सवा किलो आटा, सवा किलो शक्कर, सवा किलो घी और केला। गेहूँ के आटे को घी में भूनकर शक्कर एवं कटे केले मिलाकर प्रसाद तैयार किया जाता है। इसमें तुलसी दल अवश्य डाला जाता है, क्योंकि तुलसी के बिना विष्णु भोग अपूर्ण माना जाता है।
पूजा विधि
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करें, फिर नवग्रह एवं कुल देवता का।
- भगवान सत्यनारायण का आवाहन कर पंचामृत से स्नान कराएँ।
- रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप एवं वस्त्र अर्पित करें।
- सत्यनारायण कथा के पाँचों अध्यायों का श्रवण करें।
- आरती कर प्रसाद का वितरण करें और ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएँ।
कथा के पाँच अध्याय
कथा का सार यह है कि सत्य के प्रति निष्ठा और दिए गए वचन का पालन ही इस व्रत का मूल है।
- प्रथम अध्याय — नारद जी के प्रश्न पर भगवान विष्णु द्वारा व्रत का महत्व बताना, तथा काशी के निर्धन ब्राह्मण की कथा।
- द्वितीय अध्याय — लकड़हारे की कथा, जिसने व्रत कर दरिद्रता से मुक्ति पाई।
- तृतीय अध्याय — साधु वैश्य की कथा, जिसने संतान प्राप्ति पर व्रत करने का वचन दिया।
- चतुर्थ अध्याय — वचन भूल जाने पर साधु वैश्य एवं उसके दामाद पर आए संकट का वर्णन।
- पंचम अध्याय — राजा तुंगध्वज की कथा, जिसने प्रसाद की अवहेलना की और फल भोगा।
ध्यान रखने योग्य नियम
- कथा आरंभ होने के बाद बीच में उठना उचित नहीं माना जाता।
- प्रसाद ग्रहण किए बिना पूजा स्थल से नहीं जाना चाहिए — कथा में इसी की चेतावनी दी गई है।
- पूजा में तुलसी दल अनिवार्य है।
- व्रत करने वाला दिनभर फलाहार पर रहे और संध्या पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करे।
पूजा की सम्पूर्ण सामग्री
- भगवान सत्यनारायण का चित्र, चौकी, लाल या पीला वस्त्र
- केले के पत्ते एवं खंभे (मंडप हेतु), कलश, आम के पत्ते, नारियल
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- तुलसी दल, पंचमेवा, ऋतु फल, केला
- रोली, अक्षत, कुमकुम, हल्दी, चंदन, मौली, जनेऊ
- धूप, दीप, कपूर, पुष्प एवं पुष्पमाला
- प्रसाद हेतु — सवा किलो आटा, शक्कर, घी एवं केला
कब करें — शुभ अवसर
यह व्रत तिथि-बद्ध नहीं है, किंतु इन अवसरों पर विशेष रूप से किया जाता है: पूर्णिमा, संक्रांति, एकादशी, गृह प्रवेश, विवाह या सगाई के बाद, संतान जन्म, नया व्यापार आरंभ, किसी संकट से मुक्ति पर, अथवा ली गई मनोकामना पूर्ण होने पर। सामान्यतः अमावस्या को यह पूजा नहीं की जाती।
कथा का मूल संदेश
पाँचों अध्यायों में पात्र अलग हैं, किंतु सूत्र एक ही है — जिसने व्रत का संकल्प लेकर उसे भुला दिया, उसे कष्ट भोगना पड़ा; और जिसने स्मरण कर पुनः श्रद्धा से व्रत किया, उसका संकट दूर हुआ। साधु वैश्य ने संतान होने पर पूजा का वचन दिया पर निभाया नहीं, राजा तुंगध्वज ने प्रसाद की अवहेलना की — दोनों को परिणाम भुगतना पड़ा। कथा वस्तुतः वचन-पालन एवं विनम्रता की शिक्षा देती है, और यही इस व्रत का “सत्य” है।
पूजा के बाद क्या करें
- प्रसाद सर्वप्रथम भगवान को अर्पित कर फिर सभी उपस्थित जनों में बाँटें।
- कथा सुनने आए प्रत्येक व्यक्ति को प्रसाद अवश्य दें — बिना प्रसाद किसी को न जाने दें।
- यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन अथवा अन्नदान करें।
- पूजा में प्रयुक्त कलश का जल घर में छिड़कें और नारियल प्रसाद रूप में ग्रहण करें।