🪔 पूजा विधि

तर्पण विधि: पितरों को जल कैसे अर्पित करें

✍ vinodvinod.rawat@gmail.com 4 मिनट पढ़ें

संक्षेप में

तर्पण में जल, काले तिल और कुश लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित किया जाता है। जल की धार अंगूठे और तर्जनी के बीच से — पितृ तीर्थ से — गिराई जाती है, और जनेऊ दाहिने कंधे पर रखा जाता है। पितृ पक्ष में यह प्रतिदिन किया जाता है।

तर्पण का अर्थ है तृप्त करना। यह पितृ पक्ष का सबसे सरल और सबसे महत्वपूर्ण कर्म है — इसे कोई भी, बिना किसी विशेष सामग्री के, घर पर कर सकता है।

तीन प्रकार का तर्पण

  • देव तर्पण — देवताओं के निमित्त; जनेऊ बाएँ कंधे पर (सव्य), जल अंगुलियों के अग्र भाग से।
  • ऋषि तर्पण — ऋषियों के निमित्त; जनेऊ माला की तरह गले में (निवीत)।
  • पितृ तर्पण — पूर्वजों के निमित्त; जनेऊ दाहिने कंधे पर (अपसव्य), जल अंगूठे एवं तर्जनी के बीच से।

तीनों एक ही क्रम में — देव, ऋषि, फिर पितृ — किए जाते हैं।

सामग्री

  • ताँबे का पात्र एवं स्वच्छ जल (गंगाजल मिला हो तो उत्तम)
  • काले तिल
  • कुश (दर्भ घास) — उपलब्ध न हो तो केवल जल से भी किया जा सकता है
  • सफेद पुष्प एवं जौ
  • एक थाली अथवा खुली भूमि, जहाँ जल गिराया जा सके

विधि — चरण दर चरण

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। संभव हो तो धुली धोती पहनें।
  • दक्षिण दिशा की ओर मुख कर आसन पर बैठें — पितृ कर्म की यही दिशा है।
  • जनेऊ को दाहिने कंधे पर करें और बाईं भुजा के नीचे से निकालें।
  • पात्र में जल लेकर उसमें काले तिल डालें।
  • दोनों हाथों की अंजलि बनाएँ और कुश को अंगूठे के पास रखें।
  • जल को अंगूठे एवं तर्जनी के बीच के भाग से गिराएँ — इसे पितृ तीर्थ कहते हैं।
  • प्रत्येक पितर के नाम एवं गोत्र का स्मरण करते हुए तीन-तीन अंजलि जल अर्पित करें।
  • अंत में हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करें और कोई भी भूल रह जाने पर क्षमा माँगें।

किन-किन का तर्पण किया जाता है

परंपरा में तीन पीढ़ियों तक का तर्पण मुख्य माना जाता है — पिता, पितामह एवं प्रपितामह; तथा माता, पितामही एवं प्रपितामही। इसके साथ मातृ पक्ष (नाना-नानी), गुरु, आचार्य तथा उन सभी का जिनका इस संसार में कोई तर्पण करने वाला न हो — इन्हें “सर्व पितृ” कहा जाता है और इनके लिए भी जल अर्पित किया जाता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

  • तर्पण सदैव प्रातःकाल, सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले किया जाता है।
  • अर्पित जल पैरों के नीचे न आए — इसका विशेष ध्यान रखा जाता है।
  • तर्पण के बाद वही जल तुलसी अथवा किसी पौधे में डालना उचित माना जाता है।
  • स्त्रियाँ भी तर्पण कर सकती हैं; जनेऊ न हो तो केवल दिशा एवं भाव का पालन करें।
  • काले तिल पितृ कर्म का अनिवार्य अंग हैं — इनके बिना तर्पण अधूरा माना जाता है।

पितृ पक्ष के अतिरिक्त कब

तर्पण केवल पितृ पक्ष तक सीमित नहीं है। अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या, संक्रांति, ग्रहण के बाद तथा किसी तीर्थ स्थान पर जाने पर भी तर्पण का विधान है। अनेक परिवारों में प्रतिदिन स्नान के बाद एक अंजलि जल पितरों के निमित्त देने की परंपरा है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तर्पण किस दिशा में मुख करके करें?

दक्षिण दिशा की ओर। पितृ कर्म में यही दिशा निर्धारित है, जबकि देव कर्म पूर्व अथवा उत्तर की ओर किया जाता है।

क्या बिना कुश के तर्पण हो सकता है?

हाँ। कुश उपलब्ध न हो तो केवल जल एवं काले तिल से भी तर्पण किया जा सकता है। भाव एवं दिशा का पालन मुख्य है।

क्या स्त्रियाँ तर्पण कर सकती हैं?

हाँ। अनेक परंपराओं एवं तीर्थ स्थलों पर स्त्रियों द्वारा तर्पण एवं पिंडदान किया जाता है, विशेषकर जब कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो।

तर्पण का जल कहाँ डालें?

खुली भूमि, तुलसी के गमले अथवा किसी पौधे में। ध्यान रहे कि वह जल पैरों के नीचे न आए।

साझा करें ✆ f ✦