🪔 व्रत एवं त्योहार

एकादशी व्रत: विधि, नियम और महत्व

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संक्षेप में

एकादशी व्रत हर माह की दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि को भगवान विष्णु को समर्पित रखा जाता है। व्रत दशमी की संध्या से आरंभ होकर द्वादशी के पारण तक चलता है, और इसमें चावल का त्याग तथा सात्विक आहार मुख्य नियम हैं।

एकादशी को हरि वासर अर्थात भगवान विष्णु का दिन कहा गया है। एक वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशियाँ आती हैं, और अधिक मास होने पर यह संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का अपना नाम और कथा है — जैसे निर्जला, देवशयनी, देवउठनी और मोक्षदा एकादशी।

व्रत कब से कब तक

व्रत का वास्तविक आरंभ दशमी की संध्या से माना जाता है, जब तामसिक भोजन और चावल का त्याग किया जाता है। एकादशी को उपवास रखा जाता है और अगले दिन द्वादशी तिथि में पारण किया जाता है। पारण का समय सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले होना चाहिए।

व्रत की विधि

  • प्रातः स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष दीपक जलाकर तुलसी दल अर्पित करें।
  • विष्णु सहस्रनाम अथवा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
  • दिनभर फलाहार लें; निर्जला व्रत केवल सामर्थ्य होने पर ही रखें।
  • संध्या को एकादशी की कथा सुनें और रात्रि जागरण करें।
  • द्वादशी को ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर पारण करें।

व्रत के मुख्य नियम

  • एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है।
  • तुलसी पत्र इस दिन तोड़ना निषिद्ध है — एक दिन पूर्व तोड़कर रख लें।
  • क्रोध, कटु वचन और किसी की निंदा से बचें।
  • रोगी, गर्भवती स्त्री, वृद्धजन एवं बालक फलाहार सहित व्रत रख सकते हैं।

व्रत का महत्व

पुराणों में एकादशी व्रत को पापनाशक और मोक्षदायक बताया गया है। व्यावहारिक दृष्टि से भी माह में दो बार पाचन तंत्र को विश्राम देना शरीर के लिए हितकर माना जाता है — यही कारण है कि यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मखाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू और सेंधा नमक लिया जा सकता है। चावल, गेहूँ, दालें और सामान्य नमक वर्जित माने गए हैं।

एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यता है कि महर्षि मेधा के अंश से उत्पन्न जौ और चावल में इस तिथि को तामसिक प्रभाव होता है। आयुर्वेदिक दृष्टि से भी चावल जल तत्व बढ़ाता है, जिससे उपवास का उद्देश्य प्रभावित होता है।

पारण किस समय करना चाहिए?

पारण द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और तिथि समाप्त होने से पूर्व करना चाहिए। हरि वासर (द्वादशी का प्रथम चतुर्थांश) में पारण नहीं किया जाता।

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