गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, दीपावली के अगले दिन मनाई जाती है। इसे अन्नकूट भी कहा जाता है। 2026 में यह 10 नवंबर को पड़ रही है — कुछ पंचांगों में तिथि भेद से 9 नवंबर भी दर्शाया गया है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि कर लें।
कथा — पर्वत क्यों उठाया गया
ब्रजवासी प्रतिवर्ष इंद्र की पूजा करते थे। बालकृष्ण ने उनसे कहा कि वर्षा तो प्रकृति का नियम है, और जो पर्वत उन्हें चारा, जल एवं आश्रय देता है — गोवर्धन — पूजा उसकी होनी चाहिए। ब्रजवासियों ने ऐसा ही किया। इससे रुष्ट होकर इंद्र ने प्रलयंकारी वर्षा की। तब श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सात दिन तक सम्पूर्ण ब्रज की रक्षा की। अंततः इंद्र का अभिमान टूटा और उन्होंने क्षमा माँगी।
कथा का भाव — प्रकृति और गौ-सेवा का सम्मान, तथा अहंकार पर विनम्रता की विजय।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान के बाद घर के आँगन अथवा द्वार पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएँ।
- उसमें पेड़, गाय, ग्वाल-बाल एवं श्रीकृष्ण की आकृतियाँ भी बनाई जाती हैं।
- आकृति पर रोली, अक्षत, पुष्प, दूर्वा एवं दही अर्पित करें।
- दीप जलाकर धूप दिखाएँ और अन्नकूट का भोग लगाएँ।
- गोवर्धन की सात बार परिक्रमा करें, हाथ में जल का लोटा लेकर धार गिराते हुए।
- गौ माता का पूजन करें — तिलक कर हरा चारा एवं गुड़ खिलाएँ।
अन्नकूट — छप्पन भोग
अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पर्वत। इस दिन नई फसल के अन्न से अनेक व्यंजन बनाकर एक साथ अर्पित किए जाते हैं। परंपरागत रूप से इसमें कढ़ी-चावल, पूरी, सब्जियों की मिली-जुली सब्जी, खीर, हलवा, पुआ, बाजरे की रोटी एवं मौसमी फल सम्मिलित होते हैं। मंदिरों में यही भोग छप्पन भोग के रूप में सजाया जाता है — मान्यता है कि सात दिन तक पर्वत उठाए रखने के कारण कृष्ण ने भोजन नहीं किया था, इसलिए आठवें दिन ब्रजवासियों ने दिन के आठ पहर के हिसाब से 7×8 = 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित किए।
गौ पूजन का महत्व
इस दिन गाय एवं बैलों को स्नान कराकर सजाया जाता है, सींगों पर रंग लगाया जाता है और उन्हें विशेष भोजन दिया जाता है। ग्रामीण भारत में यह पर्व पशुधन के प्रति कृतज्ञता का दिन है। कई क्षेत्रों में इसी दिन गोवर्धन परिक्रमा (21 किलोमीटर) करने हजारों श्रद्धालु मथुरा पहुँचते हैं।