दीपावली कार्तिक अमावस्या की रात्रि को मनाई जाती है और इसे धन, समृद्धि एवं मंगल की देवी माँ लक्ष्मी तथा विघ्नहर्ता श्री गणेश की आराधना का पर्व माना जाता है। 2026 में मुख्य दिवाली 8 नवंबर, रविवार को है।
पाँच दिन का क्रम (2026)
- 6 नवंबर, शुक्रवार — धनतेरस: धन्वंतरि पूजन, बर्तन एवं धातु की खरीद
- 7 नवंबर, शनिवार — नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली: अभ्यंग स्नान, यम दीपक
- 8 नवंबर, रविवार — दीपावली: लक्ष्मी-गणेश पूजन
- 9-10 नवंबर — गोवर्धन पूजा / अन्नकूट (पंचांग भेद से तिथि बदल सकती है)
- 11 नवंबर, बुधवार — भाई दूज
लक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त
लक्ष्मी पूजन सदैव प्रदोष काल में किया जाता है — अर्थात सूर्यास्त के बाद की संध्या बेला, जब अमावस्या तिथि विद्यमान हो। 2026 में यह समय लगभग संध्या 6:29 से रात्रि 8:29 तक रहेगा, और प्रदोष काल लगभग 6:01 से 8:40 तक। स्थिर लग्न (वृषभ) में पूजन विशेष शुभ माना जाता है।
ध्यान रहे कि मुहूर्त का समय हर नगर के सूर्यास्त के अनुसार बदलता है — अपने शहर का पंचांग देखकर समय निश्चित करें।
पूजा की तैयारी
- घर की सफाई कर मुख्य द्वार पर रंगोली एवं तोरण लगाएँ।
- पूजा स्थान पर चौकी रखकर लाल वस्त्र बिछाएँ।
- गणेश जी को बाईं ओर एवं लक्ष्मी जी को दाईं ओर स्थापित करें — गणेश पूजन सदैव पहले होता है।
- कलश में जल, सुपारी, सिक्का एवं अक्षत डालकर आम के पत्ते व नारियल रखें।
- बही-खाता, तिजोरी अथवा व्यापार के उपकरणों का भी पूजन किया जाता है।
पूजन विधि
सर्वप्रथम आचमन एवं संकल्प करें। इसके बाद गणेश जी का आवाहन एवं पूजन करें, फिर माँ लक्ष्मी का। रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य अर्पित करें। लक्ष्मी जी को कमल पुष्प, बताशे, खील एवं मिठाई प्रिय हैं। तत्पश्चात कुबेर एवं सरस्वती जी का स्मरण करें, लक्ष्मी चालीसा अथवा श्री सूक्त का पाठ करें और अंत में आरती कर पूरे घर में दीप जलाएँ।
दीप जलाने के नियम
- मुख्य द्वार के दोनों ओर, तुलसी के पास, रसोई एवं जल स्थान पर दीप अवश्य रखें।
- दीपक की संख्या विषम रखने की परंपरा है — 5, 11, 21 या 51।
- घी का दीपक देवता के दाईं ओर और तेल का दीपक बाईं ओर रखा जाता है।
- पूजा के दीप को रातभर जलने देना शुभ माना जाता है।
पूजा सामग्री की सूची
- लक्ष्मी-गणेश की नई प्रतिमा अथवा चित्र, लाल वस्त्र, चौकी
- कलश, आम के पत्ते, नारियल, मौली, जनेऊ
- रोली, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, चंदन, इत्र
- कमल पुष्प, गेंदे की माला, दूर्वा, पान, सुपारी, लौंग-इलायची
- खील, बताशे, गुड़, नारियल, पंचमेवा एवं ऋतु फल
- घी एवं तेल के दीपक, रुई की बत्ती, धूप, कपूर
- चाँदी या ताँबे का सिक्का, बही-खाता, कलम
धनतेरस पर क्या खरीदें
धनतेरस भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का दिन माना जाता है, इसलिए इसे आरोग्य से भी जोड़ा जाता है। परंपरा में इस दिन धातु की वस्तु खरीदी जाती है — चाँदी का सिक्का, पीतल या स्टील के बर्तन, अथवा आभूषण। झाड़ू खरीदना भी शुभ माना जाता है, क्योंकि उसे दरिद्रता हटाने का प्रतीक कहा गया है। खरीदारी प्रदोष काल में करना उत्तम माना जाता है।
नरक चतुर्दशी एवं यम दीपक
छोटी दिवाली को प्रातः सूर्योदय से पूर्व तेल एवं उबटन से अभ्यंग स्नान किया जाता है। संध्या को घर के मुख्य द्वार अथवा दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त चार मुख वाला दीपक जलाया जाता है — इसे यम दीपक कहते हैं और इसे अकाल मृत्यु से रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
गोवर्धन पूजा और भाई दूज
गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजा की जाती है और अन्नकूट अर्थात छप्पन प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत उठाया था। भाई दूज पर बहनें भाई को तिलक कर दीर्घायु की कामना करती हैं — यह यमराज एवं यमुना की कथा से जुड़ा पर्व है।
लक्ष्मी जी के आठ स्वरूप
अष्टलक्ष्मी की उपासना दिवाली पर विशेष मानी जाती है — आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी एवं विद्या लक्ष्मी। यह संकेत है कि लक्ष्मी केवल धन नहीं, बल्कि अन्न, संतान, साहस, विजय एवं विद्या — जीवन के प्रत्येक ऐश्वर्य की देवी हैं।
दीपदान का महत्व
दीपावली का मूल भाव अंधकार पर प्रकाश की विजय है। घर के अतिरिक्त मंदिर, नदी तट, तुलसी चौरा एवं पीपल के नीचे दीप रखने की परंपरा है। आजकल मिट्टी के दीयों का प्रयोग पुनः बढ़ा है — ये पर्यावरण के अनुकूल हैं और स्थानीय कुम्हारों की आजीविका से भी जुड़े हैं।