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छठ पूजा 2026: चार दिन का क्रम, अर्घ्य का समय और विधि

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संक्षेप में

छठ पूजा 2026 का मुख्य दिन 15 नवंबर है। यह चार दिवसीय पर्व नहाय-खाय से आरंभ होकर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के साथ पूर्ण होता है। व्रती लगभग 36 घंटे निर्जला रहकर डूबते और उगते सूर्य — दोनों को अर्घ्य देते हैं।

छठ पूजा सूर्य देव एवं छठी मैया को समर्पित है और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को इसका मुख्य दिन होता है। 2026 में मुख्य छठ 15 नवंबर को है, और चार दिवसीय क्रम उससे दो दिन पूर्व आरंभ होता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं नेपाल में यह सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।

चार दिन का क्रम

  • पहला दिन — नहाय खाय: व्रती स्नान कर सात्विक भोजन करते हैं — प्रायः कद्दू-भात, चने की दाल एवं अरवा चावल, सेंधा नमक में बना हुआ। यहीं से शुद्धता का नियम आरंभ हो जाता है।
  • दूसरा दिन — खरना: दिनभर उपवास रखकर संध्या को गुड़ की खीर एवं रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद निर्जला व्रत आरंभ होता है।
  • तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य: घाट पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह छठ की सबसे विशिष्ट परंपरा है — संसार में कम ही पर्व हैं जिनमें अस्त होते सूर्य की पूजा होती हो।
  • चौथा दिन — उषा अर्घ्य: अगले प्रातः उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। कुल मिलाकर व्रती लगभग 36 घंटे निर्जल रहते हैं।

पूजा सामग्री

  • बाँस की टोकरी (दउरा), सूप एवं डगरा
  • ठेकुआ (गुड़ एवं आटे का प्रसाद), चावल के लड्डू
  • गन्ना, नारियल, केला, सेब, नींबू (डाभ), सिंघाड़ा, शकरकंद, सुथनी
  • हल्दी, अदरक एवं मूली सहित पत्तों वाली सब्जियाँ
  • दीपक, धूप, सिंदूर, कपूर, गंगाजल
  • नए वस्त्र — व्रती प्रायः बिना सिला वस्त्र धारण करते हैं

अर्घ्य कैसे दिया जाता है

व्रती जल में कमर तक खड़े होकर सूप में फल एवं ठेकुआ रखकर, दोनों हाथों से सूर्य की ओर अर्घ्य अर्पित करते हैं। परिवारजन दीप जलाकर साथ खड़े रहते हैं और छठ के लोकगीत गाए जाते हैं। संध्या अर्घ्य सूर्यास्त के समय और उषा अर्घ्य सूर्योदय के समय दिया जाता है — दोनों का समय स्थानीय पंचांग से देखें।

ठेकुआ — मुख्य प्रसाद

गेहूँ के आटे में गुड़, थोड़ा घी एवं सौंफ मिलाकर कड़ा आटा गूँथा जाता है, साँचे से आकार देकर धीमी आँच पर घी में तला जाता है। शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है — प्रसाद बनाते समय नमक का प्रयोग नहीं होता और रसोई अलग से शुद्ध की जाती है।

व्रत के नियम

  • चारों दिन घर में लहसुन-प्याज एवं मांसाहार पूर्णतः वर्जित।
  • प्रसाद बनाते समय एवं घाट पर जूते-चप्पल नहीं पहने जाते।
  • व्रती पलंग पर नहीं, भूमि पर चादर बिछाकर विश्राम करते हैं।
  • प्रसाद बनाने से पूर्व स्नान अनिवार्य है।
  • घाट की स्वच्छता का ध्यान रखें — आजकल अनेक शहरों में कृत्रिम घाट भी बनाए जाते हैं।

छठी मैया कौन हैं

लोक परंपरा में छठी मैया को सूर्य देव की बहन तथा संतान की रक्षक देवी माना जाता है। पुराणों में इन्हें देवसेना अथवा प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी देवी कहा गया है — इसीलिए पूजा षष्ठी तिथि को होती है। संतान के जन्म के छठे दिन होने वाला “छठी” संस्कार भी इन्हीं से जुड़ा है। यही कारण है कि छठ मुख्यतः संतान की कुशलता एवं परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है।

व्रत का ऐतिहासिक आधार

मान्यताओं के अनुसार महाभारत काल में द्रौपदी ने पांडवों की भलाई के लिए यह व्रत किया था, और कर्ण — जो स्वयं सूर्यपुत्र थे — प्रतिदिन कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। रामायण परंपरा में कहा जाता है कि लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य आराधना की थी।

घाट पर क्या ध्यान रखें

  • घाट पर पहुँचकर पहले स्थान की सफाई करें और चौक बनाकर सूप रखें।
  • जल में उतरने से पहले गहराई की जानकारी लें — भीड़ वाले घाटों पर बच्चों को अकेला न छोड़ें।
  • दीपक जलाते समय हवा की दिशा देखें; मिट्टी के दीयों का प्रयोग करें।
  • प्लास्टिक एवं थर्मोकोल का प्रयोग न करें — पूजा सामग्री केले के पत्ते, बाँस एवं मिट्टी की होनी चाहिए।
  • पूजा के बाद घाट को स्वच्छ छोड़कर आएँ — यह व्रत की शुद्धता का ही विस्तार है।

कोसी भरना

जिन घरों में मनोकामना पूर्ण होती है — विशेषकर संतान प्राप्ति पर — वहाँ कोसी भरने की परंपरा निभाई जाती है। संध्या अर्घ्य के बाद आँगन में गन्ने के खंभों से मंडप बनाकर उसके नीचे मिट्टी के हाथी एवं दीये रखे जाते हैं, और रातभर दीप जलाए रखे जाते हैं। अगली सुबह यही कोसी घाट पर ले जाई जाती है।

सूर्य उपासना का व्यावहारिक पक्ष

छठ की परंपराएँ स्वास्थ्य से भी जुड़ी हैं। प्रातःकालीन एवं सायंकालीन सूर्य की किरणें सबसे कोमल होती हैं और उस समय जल में खड़े होकर सूर्य के सम्मुख रहना विटामिन-डी एवं मानसिक संतुलन दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है। ठेकुआ जैसे प्रसाद गुड़ आधारित हैं — जो सर्दी के आरंभ में शरीर के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। यही कारण है कि छठ को भारत के सबसे अनुशासित लोकपर्वों में गिना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठ पूजा 2026 में कब है?

2026 में छठ का मुख्य दिन (संध्या अर्घ्य) 15 नवंबर है। नहाय-खाय दो दिन पूर्व आरंभ होता है और उषा अर्घ्य अगले प्रातः होता है।

छठ व्रत कितने घंटे का होता है?

खरना के बाद से उषा अर्घ्य तक — लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत।

डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

छठ में सूर्य के दोनों रूपों — अस्त और उदय — की पूजा होती है। मान्यता है कि अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना कृतज्ञता का प्रतीक है, क्योंकि जो अंत में भी साथ दे, उसका आभार सबसे बड़ा होता है।

क्या पुरुष भी छठ व्रत रख सकते हैं?

हाँ। छठ स्त्री-पुरुष दोनों रखते हैं। अनेक परिवारों में पुरुष व्रती भी पूरे विधान के साथ यह व्रत करते हैं।

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