रविवार भगवान सूर्य का दिन है। वेदों में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है — जिन्हें प्रतिदिन देखा जा सकता है। ज्योतिष में सूर्य आत्मा, पिता, यश, नेतृत्व एवं आरोग्य का कारक है।
व्रत का उद्देश्य
यह व्रत नेत्र रोग, त्वचा विकार, हड्डी की दुर्बलता, आत्मविश्वास की कमी, पिता से मतभेद अथवा कार्यक्षेत्र में सम्मान न मिलने की स्थिति में किया जाता है। कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो भी रविवार व्रत की सलाह दी जाती है।
अर्घ्य देने की सही विधि
- सूर्योदय के समय स्नान कर लें — यही अर्घ्य का श्रेष्ठ समय है।
- ताँबे के लोटे में जल लें और उसमें रोली, लाल पुष्प एवं अक्षत डालें।
- पूर्व दिशा की ओर मुख कर, दोनों हाथों से लोटा सिर के ऊपर उठाकर धीरे-धीरे जल की धार गिराएँ।
- धार में से सूर्य के दर्शन करें — यह परंपरा का विशेष अंग है।
- “ॐ घृणि सूर्याय नमः” अथवा गायत्री मंत्र का जाप करें।
- अर्घ्य का जल पैरों से न लगे, इसका ध्यान रखें — इसलिए किसी गमले या पवित्र स्थान पर अर्घ्य दें।
पूजा विधि
अर्घ्य के बाद सूर्य देव का ध्यान करें, लाल पुष्प एवं लाल चंदन अर्पित करें, गुड़ अथवा गेहूँ से बनी वस्तु का भोग लगाएँ और आदित्य हृदय स्तोत्र अथवा सूर्य चालीसा का पाठ करें। सूर्य नमस्कार इसी दिन आरंभ करना विशेष शुभ माना जाता है।
व्रत के नियम
- दिन में एक बार भोजन, वह भी सूर्यास्त से पूर्व।
- इस दिन नमक का त्याग किया जाता है — यह रविवार व्रत का सबसे प्रमुख नियम है।
- तेल से बनी वस्तुएँ एवं तामसिक भोजन वर्जित।
- इस दिन बाल एवं नाखून नहीं काटे जाते।
- प्रायः 12, 21 अथवा 30 रविवार का संकल्प लिया जाता है।
दान एवं उपाय
लाल एवं सुनहरी वस्तुओं का दान — गेहूँ, गुड़, लाल वस्त्र, ताँबा अथवा मसूर दाल। पिता एवं बड़ों का सम्मान करना सूर्य को बल देने वाला सबसे प्रभावी उपाय माना गया है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय अर्घ्य देना, भले ही व्रत न रखें, स्वास्थ्य एवं अनुशासन दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है।