श्री गणेश प्रथम पूज्य देव हैं — किसी भी शुभ कार्य का आरंभ उनकी वंदना से होता है। "जय गणेश जय गणेश देवा" गणपति की सबसे प्रसिद्ध आरती है, जो गणेश चतुर्थी सहित प्रत्येक पूजा में गाई जाती है। नीचे इसका शुद्ध एवं सम्पूर्ण पाठ दिया गया है। श्रद्धापूर्वक गणेश आरती करने से विघ्नों का नाश और बुद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है।
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
॥ जय गणेश देवा ॥
गणेश आरती कब की जाती है?
किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सबसे पहले गणेश जी की आरती होती है। बुधवार उन्हें विशेष प्रिय है, और गणेश चतुर्थी पर दस दिन तक प्रातः-संध्या आरती की जाती है।
"जय गणेश जय गणेश देवा" आरती किसने लिखी?
यह पारंपरिक आरती है, जिसे पं. रामदास जी से जोड़ा जाता है। यह भारत की सर्वाधिक गाई जाने वाली आरतियों में से एक है।
गणेश जी को क्या भोग प्रिय है?
मोदक सर्वाधिक प्रिय हैं, साथ ही लड्डू, दूर्वा घास और केला। दूर्वा की इक्कीस गाँठें अर्पित करने की परंपरा है।
गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती?
पुराणों की एक कथा के अनुसार तुलसी को गणेश जी का शाप प्राप्त था, इसी कारण उनकी पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है। इसके स्थान पर दूर्वा अर्पित की जाती है।
आरती के बाद क्या करना चाहिए?
आरती की ज्योति पर हाथ रखकर उसे मस्तक से लगाया जाता है, फिर प्रसाद बाँटा जाता है। दीप को स्वयं शांत होने दें, फूँक मारकर न बुझाएँ।