दुर्गा सप्तशती पाठ विधि — नौ दिन का क्रम, अंग पाठ और नियम
संक्षेप में
दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण का वह अंश है जिसमें देवी के सात सौ श्लोक संगृहीत हैं — इसीलिए नाम सप्तशती। तेरह अध्याय तीन चरित्रों में बँटे हैं, और पाठ कवच–अर्गला–कीलक से आरंभ होकर देवी सूक्त पर पूर्ण होता है। नवरात्रि में इन तेरह अध्यायों को नौ दिनों में बाँटकर पढ़ने की परंपरा है।
दुर्गा सप्तशती क्या है
दुर्गा सप्तशती कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं, मार्कण्डेय पुराण का एक भाग है। इसे देवी माहात्म्य और चंडी पाठ भी कहा जाता है। इसमें सात सौ श्लोक हैं, और यही संख्या इसके नाम में है — सप्त शती अर्थात सात सौ।
पूरा पाठ संस्कृत में है। तीन कथाएँ इसमें क्रम से आती हैं, और तीनों में देवी एक ही शक्ति के तीन स्वरूपों में प्रकट होती हैं।
तीन चरित्र और तेरह अध्याय
| चरित्र | अध्याय | देवी स्वरूप | कथा |
|---|---|---|---|
| प्रथम चरित्र | अध्याय 1 | महाकाली | मधु एवं कैटभ का वध। भगवान विष्णु की योगनिद्रा से देवी का प्राकट्य और सृष्टि की रक्षा। |
| मध्यम चरित्र | अध्याय 2–4 | महालक्ष्मी | महिषासुर का वध। समस्त देवताओं के तेज से देवी का प्रादुर्भाव और महिषासुरमर्दिनी रूप। |
| उत्तम चरित्र | अध्याय 5–13 | महासरस्वती | शुम्भ एवं निशुम्भ का वध। इसी चरित्र में कौशिकी, कालरात्रि एवं चामुंडा स्वरूपों का वर्णन आता है। |
अंग पाठ का क्रम
मूल तेरह अध्यायों से पहले और बाद में कुछ स्तोत्र पढ़े जाते हैं — इन्हें अंग कहा जाता है। क्रम इस प्रकार है:
- देवी कवच — पाठ से पूर्व — रक्षा हेतु।
- अर्गला स्तोत्र — कवच के पश्चात — पाठ का द्वार खोलने वाला।
- कीलक स्तोत्र — अर्गला के पश्चात — पाठ की कीलन खोलने वाला।
- रात्रि सूक्त — कीलक के पश्चात, मूल पाठ आरंभ होने से ठीक पहले।
- मूल सप्तशती — तेरह अध्याय — तीन चरित्रों में।
- देवी सूक्त — पाठ पूर्ण होने पर।
केवल मूल पाठ करके कवच, अर्गला और कीलक छोड़ देने की परंपरा नहीं है। समय कम हो तो कम अध्याय पढ़ें, पर अंग न छोड़ें — यही सामान्य मान्यता है।
नवरात्रि में नौ दिन का क्रम
तेरह अध्यायों को नौ दिनों में बाँटने का एक प्रचलित क्रम नीचे है। ध्यान रहे — यह परंपरा से चला आया विभाजन है, शास्त्रीय विधान नहीं। अलग-अलग परंपराओं में क्रम भिन्न मिलता है, इसलिए अपने कुल या गुरु की परंपरा हो तो उसी का पालन करें।
| दिन | अध्याय | प्रसंग |
|---|---|---|
| दिन 1 | अध्याय 1 | प्रथम चरित्र पूर्ण |
| दिन 2 | अध्याय 2–3 | महिषासुर संग्राम |
| दिन 3 | अध्याय 4 | शक्रादि स्तुति |
| दिन 4 | अध्याय 5–6 | देवी दूत संवाद एवं धूम्रलोचन वध |
| दिन 5 | अध्याय 7 | चंड-मुंड वध — चामुंडा नाम की प्राप्ति |
| दिन 6 | अध्याय 8 | रक्तबीज वध |
| दिन 7 | अध्याय 9–10 | निशुम्भ एवं शुम्भ वध |
| दिन 8 | अध्याय 11 | नारायणी स्तुति |
| दिन 9 | अध्याय 12–13 | फलश्रुति एवं समापन |
2026 में एक बात ध्यान रखें — इस वर्ष सप्तमी तिथि की वृद्धि है, इसलिए नवरात्रि 10 दिन की है (11 से 20 अक्टूबर)। पाठ नौ दिन का ही रहता है — दूसरी सप्तमी के दिन नया अध्याय न लेकर उसी दिन का पाठ दोहराने अथवा नवार्ण जप करने की परंपरा है। नवरात्रि 2026 का पूरा तिथि कैलेंडर देखें।
नवार्ण मंत्र
सप्तशती का बीज मंत्र नौ अक्षरों का है, इसीलिए इसे नवार्ण कहते हैं:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
प्रत्येक अध्याय के आरंभ और अंत में इस मंत्र का जप करने की परंपरा है। नवरात्रि में नौ दिन इसी मंत्र की माला करने का विधान भी प्रचलित है।
पाठ के नियम
- पाठ से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और संकल्प लें — कितने दिन में, किस निमित्त पाठ करना है।
- एक ही आसन पर बैठें; ऊन अथवा कुश का आसन परंपरा में उत्तम माना गया है।
- अध्याय आरंभ करने के बाद उसे पूरा करें — बीच में उठना उचित नहीं माना जाता।
- उच्चारण स्पष्ट रखें। संस्कृत कठिन लगे तो हिंदी अनुवाद सहित पाठ करने की छूट परंपरा में है।
- पुस्तक को भूमि पर न रखें — चौकी अथवा वस्त्र पर रखें।
- पाठ पूर्ण होने पर देवी सूक्त पढ़कर आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।
किस कामना से कौन सा चरित्र
परंपरा में तीनों चरित्रों को अलग-अलग भाव से जोड़ा गया है — प्रथम चरित्र को बाधा-निवारण से, मध्यम को शत्रु एवं संकट से रक्षा से, और उत्तम चरित्र को ज्ञान एवं मोक्ष से। समय कम हो तो किसी एक चरित्र का पाठ भी किया जाता है, पर अंग सहित।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती में कितने श्लोक और कितने अध्याय हैं?
सात सौ श्लोक — इसी से नाम सप्तशती पड़ा। ये तेरह अध्यायों में विभाजित हैं, और तेरह अध्याय तीन चरित्रों में बँटे हैं।
दुर्गा सप्तशती किस ग्रंथ का अंश है?
मार्कण्डेय पुराण का। इसे देवी माहात्म्य एवं चंडी पाठ भी कहा जाता है।
सप्तशती का पाठ किस क्रम में करना चाहिए?
पहले देवी कवच, फिर अर्गला स्तोत्र, फिर कीलक स्तोत्र, उसके बाद रात्रि सूक्त — तब मूल तेरह अध्याय, और अंत में देवी सूक्त। बिना कवच-अर्गला-कीलक के केवल मूल पाठ करने की परंपरा नहीं है।
नवरात्रि में नौ दिन में पूरा पाठ कैसे करें?
एक प्रचलित क्रम है — पहले दिन अध्याय 1, दूसरे दिन 2–3, तीसरे दिन 4, चौथे दिन 5–6, पाँचवें 7, छठे 8, सातवें 9–10, आठवें 11 और नवें दिन 12–13। यह विभाजन परंपरा से चला आया है, शास्त्रीय विधान नहीं — अलग-अलग परंपराओं में क्रम भिन्न मिलता है।
नवार्ण मंत्र क्या है?
नौ अक्षरों का मंत्र — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। सप्तशती पाठ के साथ इसी मंत्र का जप करने की परंपरा है, इसीलिए इसे सप्तशती का बीज मंत्र कहा जाता है।
क्या सप्तशती का पाठ बीच में रोका जा सकता है?
एक अध्याय आरंभ करने के बाद उसे पूरा करने की परंपरा है। अध्याय के बीच में उठना उचित नहीं माना जाता, इसीलिए बैठने से पहले उतना समय निकालकर बैठें।
सप्तशती का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी श्रद्धालु। संस्कृत उच्चारण कठिन लगे तो हिंदी अनुवाद सहित पाठ करने की छूट परंपरा में मानी गई है — भाव शुद्ध होना अधिक महत्व रखता है।
सप्तशती और दुर्गा चालीसा में क्या अंतर है?
सप्तशती संस्कृत का सात सौ श्लोकों वाला पुराण-अंश है; दुर्गा चालीसा हिंदी की चालीस चौपाइयों की स्तुति है। समय कम हो तो चालीसा, और नवरात्रि जैसे अनुष्ठान में सप्तशती की परंपरा है।