श्री शनिदेव कर्मफलदाता एवं न्याय के देवता हैं। "जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी" शनिदेव की सर्वप्रिय आरती है, जो विशेषकर शनिवार को श्रद्धापूर्वक गाई जाती है। नीचे इसका शुद्ध एवं सम्पूर्ण पाठ दिया गया है। भक्तिभाव से शनि आरती करने पर साढ़ेसाती, ढैया एवं शनि दोष के कष्ट शांत होकर शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी ।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव ॥
क्रीट मुकुट शीश सहज दिपत है लिलारी ।
मुक्तन की माल गले शोभित बलिहारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव ॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
लोहा, तिल, तेल, उड़द महिषी अति प्यारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव ॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी ।
विश्वनाथ धरत ध्यान हम हैं शरण तुम्हारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव ॥
शनिदेव की आरती कब करनी चाहिए?
शनिवार शनिदेव का दिन है और संध्या के समय दीप जलाकर आरती करने की परंपरा है। शनि अमावस्या एवं शनि जयंती पर विशेष महत्व है।
शनिदेव को क्या अर्पित किया जाता है?
सरसों अथवा तिल का तेल, काले तिल, काला वस्त्र, उड़द, लोहा एवं नीले पुष्प। तेल अर्पित करना सबसे प्रचलित परंपरा है।
शनिदेव की आँखों में क्यों नहीं देखना चाहिए?
परंपरा में मान्यता है कि शनिदेव की दृष्टि तीव्र होती है, इसलिए प्रतिमा के चरणों की ओर देखकर पूजा की जाती है। यह भय का नहीं, विनम्रता का भाव है।
साढ़े साती में क्या करना चाहिए?
परंपरागत उपाय हैं — शनिवार को तेल दान, हनुमान चालीसा का पाठ, काले तिल एवं उड़द का दान, तथा जरूरतमंदों की सहायता। शनि कर्म का फल देने वाले माने गए हैं, इसलिए आचरण की शुद्धता को ही सबसे बड़ा उपाय बताया गया है।
शनिवार को क्या नहीं करना चाहिए?
परंपरा में इस दिन तेल एवं लोहा खरीदना, बाल कटवाना तथा किसी का अपमान करना टाला जाता है। मांस-मदिरा का त्याग किया जाता है।